….और भाऊ ने संस्मरण में ढूंढ लिया अपने सवालों का जवाब

….और भाऊ ने संस्मरण में ढूंढ लिया अपने सवालों का जवाब
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कुछ दिनों पहले फेसबुक पर लिखा गया राजीव ओझा का संस्मरण पढ़ा। राजीव ओझा वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों लखनऊ में कार्यरत हैं। वह मूल रूप से गोरखपुर के हैं और लंबे समय तक गोरखपुर में ‘राष्ट्रीय सहारा’ में कार्यरत रहे हैं। फेसबुक वाल पर ही इस संस्मरण पर की गई प्रतिक्रियाओं में से राघवेन्द्र दुबे की टिप्पणी ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। वही, राघवेन्द्र दुबे, जो हिंदी पट्टी के पत्रकारों की जमात के अलावा अपने मित्रों-शुभचिंतकों में भी भाऊ के नाम से ज्यादा मशहूर हैं। भाऊ ने इस संस्मरण में ‘रामायण’ धारावाहिक के दूरदर्शन पर पुन: प्रसारण पर उठाए गए अपने सवालों का जवाब भी ढूंढ लिया। भाऊ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। वह अपने वक्तृता कौशल और जबरदस्त वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए भी जाने जाते हैं। धारा के साथ चलना तो जैसे उन्हें सुहाता ही नहीं। उनकी इस टिप्पणी के आलोक में राजीव ओझा का यह संस्मरण अब वैचारिक बहस को आमंत्रित करने लगा है।

फेसबुक पर लिखी गई राघवेन्द्र दुबे (भाऊ) की टिप्पणी-

अद्भुत संस्मरण, क्या लयात्मक, काव्यात्मक नैरेशन है। मन खुश कर दिया। पक्तियों के बीच खुद को देखा तो इस बात पर और खुशी हुई कि विभाजन, अकेले-अकेले होते जाने को फैशन के तौर पर स्वीकार कर चुके और संवादहीनता के इस दौर में भी आप रिश्तों को संभाले रखने, बनाए रखने में यकीन करते हैं। याद आता है राहुल गांधी पर लिखी मेरी किताब ‘जैसे सांस देश की’ पर भी बहुत भावप्रवण ढंग से सबसे पहले आपने ही लिखा। धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज के खानदानी, आपकी लेखन शैली का तमाम वैचारिक असहमति के बावजूद शिल्प के स्तर पर मैं बड़ा प्रशंसक हूं। कितनी खूबी से आपने किसी सागर के रामायण धारावाहिक की प्रासंगिता भी साबित कर दी, उसकी कोई चर्चा किए बिना। बड़े कारीगर हो गुरु। आपने सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को भी बहुत मासूमियत से अपने पक्ष का तर्क पकड़ा दिया। हमारे जैसे और सबसे पहले तो रवीश कुमार ने ही पूछा था-किसने मांग की रामायण धारावाहिक दिखाने की? फिर आपने यह भी बता दिया कि बड़ी से बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि भी समाज को उस तरह प्रभावित नहीं कर पाती जितना एक महाकाव्य । बधाई हो!’

फेसबुक पर लिखा गया राजीव ओझा का संस्मरण–

: तुलसी की चौपाइयां सुनाकर सुलझा दिया था विवाद :

टेलीविजन के इतिहास में लोकप्रियता का नया मापदंड तय करने वाले रामानंद सागर के धारावाहिक ‘रामायण’ का 33 वर्षों बाद पुन: प्रसारण होने और एक बार फिर उसके लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंचने की चर्चाओं के बीच अचानक मुझे गोरखपुर में पत्रकारिता के दिनों की एक याद ताजा हो गई। यह एक ऐसा संस्मरण है, जिस पर उस समय मैंने ‘राष्ट्रीय सहारा’ के गोरखपुर संस्करण में खबर भी लिखी थी। घटनाक्रम का समय तो ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन इतना याद है कि तब मैं ‘राष्ट्रीय सहारा’ के रिपोर्टर के रूप में जिला प्रशासन ‘बीट’ भी देखता था। अखबारी कारोबार से जुड़े लोग ‘बीट’ का मतलब ठीक से समझते हैं। उस समय अखबार में मेरी एक खबर छपी थी-‘तुलसी की चौपाइयों से सुलझा भाइयों का वर्षों पुराना आपसी विवाद।’ यह खबर तत्कालीन अपर जिलाधिकारी (नगर) राम विशाल मिश्र की सफलता पर लिखी गई थी, जिससे मैं खासा प्रभावित हुआ था। यह प्रसंग ही ऐसा था कि कोई भी इस विवाद के निपटारे के तरीके से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।

प्रसंग की शुरुआत गोरखपुर में जिलाधिकारी कार्यालय के सामने स्थित इमली के पेड़ के नीचे एक व्यक्ति के धरने से होती है। वही इमली का पेड़ जिसके नीचे धरना-प्रदर्शन पर बाद में आए एक जिलाधिकारी राजन शुक्ला ने रोक लगा दी थी और ‘राष्ट्रीय सहारा’ में ही वरिष्ठ पत्रकार राघवेन्द्र दुबे ने लिखा था-‘गोरखपुर में लोकतंत्र फिलहाल स्थगित है।’ खैर, इस प्रसंग के समय जिलाधिकारी अनिल संत थे। धरना दे रहे व्यक्ति की शिकायत यह थी कि उसे राजस्व अभिलेखों में मार दिया गया है यानी अभिलेखों में उसे मृतक दर्शाकर उसकी सम्पत्ति बड़े भाई के नाम पर दर्ज कर दी गई है। अखबारों के लिए पहले दिन का यह मामला भी कम रोचक नहीं था। तत्कालीन जिलाधिकारी ने उससे ज्ञापन प्राप्त किया और जांच के लिए मामला अपर जिलाधिकारी (नगर) राम विशाल मिश्र के पास भेज दिया। मिश्रा जी उस समय तक गोरखपुर में ‘रामायणी’ के रूप में अपनी ख्याति बना चुके थे। प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री और गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ जी भी उनकी इस पहचान से भिज्ञ थे और कभी-कभी रामचरितमानस के प्रति उनके अनुराग की चर्चा भी करते थे। खैर, जांच मिलने के बाद मिश्रा जी ने पहले धरना दे रहे उस भाई को अपने कक्ष में बुलवाया और उसकी पूरी बात सूनी। संयोगवश मैं भी उस समय कुछ अन्य पत्रकार साथियों के साथ उनके कक्ष में मौजूद था। हम लोगों ने देखा कि अचानक वह अपने बड़े भाई पर दोषारोपण करते उस व्यक्ति पर भड़क उठे, बोले-पहले तुम बताओ कि क्या तुम भरत हो। तुलसीदास जी की एक चौपाई सुनाते हुए उससे बोले कि पहले तुम भरत बनो। पहले तो वह इससे नाराज हो गया, लेकिन फिर संभला और कहा कि मेरे बड़े भाई ने राम जैसा आचरण किया है क्या? विवाद सुलझाने के लिए मिश्रा जी ने दूसरे दिन बड़े भाई को बुलवाया और फिर दोनों भाइयों को एक साथ अपने कमरे में बैठाकर चौपाइयों के सहारे रामायण के प्रसंगों से भिगो ही दिया। बड़े भाई को राम के आदर्शों की याद दिलाई तो छोटे भाई को भरत के त्याग का एहसास कराया। फिर दोनों से कहा कि क्या तुम लोग बचपन में एक मां की गोद में नहीं खेले, एक साथ भोजन नहीं क्या, एक साथ नहीं खेलते रहे, आज साथ घर जाओ, एक साथ भोजन करना और अलग-बगल चारपाई डालकर सोना, कल दोनों साथ मेरे पास आना तो मामले का निपटारा करेंगे। अगले दिन ठीक 11 बजे मिश्रा जी के कार्यालय का दृश्य एकदम बदला हुआ था, दोनों भाइयों की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। दोनों ने मिश्रा जी पर फैसला छोड़ दिया और कोर्ट में न जाने का संकल्प जताया। तब तक मिश्रा जी दोनों के विवाद पर तहसील से रिपोर्ट मंगवा चुके थे, जिसमें जमीन-जायदाद का ब्योरा भी था। मिश्रा जी ने देखा कि जब छोटा भाई बाहर कमाने गया हुआ था तो बड़े भाई ने दस्तावेजों में उसे मृतक दिखाकर सारी जमीनें न सिर्फ अपने नाम करा ली थी बल्कि उसका कुछ हिस्सा बेच भी दिया था। बस इसमें एक अहम बात इतनी ही थी कि बड़े भाई पर जिम्मेदारियां ज्यादा दी थीं, उसकी बेटियां भी शादी योग्य हो गई थीं। अब फैसले की घड़ी थी। मिश्रा जी ने पहले छोटे भाई को इस बात का एहसास कराया कि उसके बड़े भाई पर जिम्मेदारियां ज्यादा हैं, इसलिए पहले तो वह उसके द्वारा बेच दी गई जमीन पर अपना दावा छोड़ दे। इसके बाद उन्होंने अभिलेखों में उस समय उपलब्ध जमीनों का दोनों में आधा-आधा बंटवारा कर देने का फैसला सुनाया। दोनों पर रामायण के प्रसंगों का ऐसा गहरा असर हो चुका था कि वे इस पर खुशी-खुशी राजी हो गए। इतना नहीं छोटे भाई ने गांव के मकान पर अपना दावा खुद ही छोड़ दिया और कहा कि बड़े भाई का परिवार बड़ा है, वह गाांव में अपने हिस्से की जमीन पर नया घर बनवा लेगा। इस तरह आपसी सहमति से यह विवाद कोर्ट में गए बिना ही सुलझ गया। मिश्रा जी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर छोटे भाई का नाम भू-अभिलेखों में दोबारा दर्ज करवाया और दोनों के बंटवारे को कानूनी तौर पर अमली जामा पहनवाया।

विवाद के पटाक्षेप के बाद एक दिन यूं ही पत्रकारों के बीच बातचीत में मिश्रा जी के सामने उनके फैसले पर चर्चा होने लगी। फिर मिश्रा जी ने न्याय और निर्णय को दो अलग-अलग विषय बताते हुए उसकी व्याख्या की। उन्होंने कहा कि न्याय यह है कि जिसकी जितनी भूख हो, उसको उतनी रोटी दी जाए लेकिन निर्णय यह होता है कि दो भाई हैं तो दोनों का आधा-आधा हिस्सा होता है। दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति न बन पाने पर पीठासीन अधिकारी निर्णय करने को बाध्य होते हैं। यह रामचरित मानस की चौपाइयों और उसके पात्रों के चरित्रबल की ताकत है कि युगों बाद भी वह अपना प्रभाव डालती हैं। मिश्रा जी बाद में आईएएस कैडर में प्रोन्नत हुए। सेवाकाल के अंतिम दिनों में वह महोबा के डीएम और चित्रकूटधाम के मंडलायुक्त रहे। अब वह रिटायर होकर लखनऊ में रह रहे हैं। वह बताते हैं कि पूरे सेवाकाल में रामचरितमानस हमेशा उनका मार्गदर्शन करता रहा।

लेखनी : मनीष मिश्रा

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