लखनऊ :जानिए क्या है TOM ? जो प्रभावित करता है बंगाल के चुनावी नतीजों को। दीदी को दस साल हो गए, एक बार किसी और को मौका देकर देखा जाए।

लखनऊ :जानिए क्या है TOM ? जो प्रभावित करता है बंगाल के चुनावी नतीजों को। दीदी को दस साल हो गए, एक बार किसी और को मौका देकर देखा जाए।
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TOM, यानी टॉप ऑफ मांइड, यानीजो जेहन में सबसे ऊपर हो। ‘आखिर राजनीति में टॉम’ की कहानी बताने का क्या मतलब हो सकता है ? दरअसल पिछले दिनों बंगाल चुनावी मौसम में बंगाल के रुझान का अंदाजा लगाने की कोशिश की गई। उसी कोशिश में यहां ‘टॉम’ दिखा। यह ‘टॉम’ बंगाल के नतीजों को बहुत ज्यादा प्रभावित करता दिख रहा है।

बंगाली ,हिंदी में बताते हैं चुनावी नतीजे।

बांग्ला भाषियों का राज्य है, लेकिन यहां हिंदी भी आमतौर पर बोली और सुनी जा सकती है। क्योंकि यहां यूपी, बिहार, झारखंड, राजस्थान, गुजरात जैसे राज्यों से आए लोग यहां कई पीढ़ियों से बड़ी तादाद में है। अनुमान के अनुसार बंगाल में सवा करोड़ से ज्यादा हिंदी भाषी रह रहे हैं, जिनमें से तीन-चौथाई बंगाल की मतदाता सूची में बतौर वोटर दर्ज हैं। अगर कोलकाता के सबसे बड़े बिजनेस वाले इलाके बड़ा बाजार में दाखिल हुआ जाये तो यह महसूस होगा कि जैसे आप किसी हिंदी भाषी राज्य के बाजार में आ गए हैं। कोलकाता के अलावा नॉर्थ 24 परगना, पुरुलिया, आसनसोल, सिलीगुड़ी, खड़गपुर और दुर्गापुर में भी हिंदी भाषी राज्यों के लोगों की तादाद इतनी हो चुकी है कि वे वहां के चुनावी नतीजों को बिना समय लिए बेबाक बोलते हैं। लेफ्ट या टीएमसी से उनका वैसा राब्ता नहीं बन पाया है, जैसा अपने राज्य की पार्टियों से बना हुआ है। उनको लेकर वे इस तरह बात करते हैं, जैसे वे उन पार्टियों का हिस्सा हों। अपने राज्य के नेताओं से अच्छी तरह परिचित हैं। उनसे जुड़े तमाम किस्से उनके पास हैं। राज्यों में रह रहे उनके परिवार के सदस्य उन्हीं पार्टियों को वोट भी डालते हैं। चूंकि ज्यादातर हिंदी भाषी राज्यों में इन दिनों बीजेपी का दबदबा है, इस वजह से बंगाल में भी हिंदी भाषियों के बीच बीजेपी का ही दबदबा दिखाई पड़ रहा है।

TOM को फॉलो कर,हिंदी में क्या बोले बंगाली ?

बक्सर के रहने वाले अरुण उपाध्याय पिछले 33 सालों से बंगाल में रह रहे हैं।उनसे पूछा गया किसको वोट दोगे तो कहने लगे, ‘छुपाना क्या, बिहार में पूरा खानदान भाजपाई है, बंगाल में रहकर मैं कम्युनिस्ट तो हो नहीं जाऊंगा, बीजेपी को ही देता हूं, इस बार भी उसी को दूंगा।’ यूपी के आजमगढ़ जिले के रहने वाले अजीत यादव नया बाजार में सड़क के किनारे कपड़े बेचते हैं। पूछा गया क्या चल रहा है तो बोले, बीजेपी जीत रही है। जब पूछा गया कि अखिलेश यादव के इलाके से हो और अखिलेश यादव टीएमसी को वोट डालने को बोल रहे हैं, तो कहने लगे कि समाजवादी पार्टी अगर यहां होती तो उसको ही वोट कर देते, लेकिन वह तो लड़ नहीं रही।
संदीप मंडल झारखंड के रहने वाले हैं, पिछले कई सालों से टैक्सी चला रहे हैं, बंगाल के वोटर बन चुके हैं। उनसे पूछा गया कि किसको जिता रहे हो, तो बोले, बीजेपी जीत रही है।
पार्क स्ट्रीट पर एक साड़ी की दुकान पर काम करने वाले कई कर्मचारी जो बनारस के मूल निवासी थे , पूछा गया कि ‘चुनाव में कौन जीत रहा है’ बोले, बनारस का हूं, आप खुद ही समझ लो कि चुनाव में क्या चल रहा होगा?

दीदी को दस साल हो गए, एक बार किसी और को मौका देकर देखा जाए।

हिंदी भाषी वोटरों के बढ़ते दबदबे और उनके रुझान को ममता बनर्जी ने काफी पहले से समझना शुरू कर दिया था। उन्होंने हिंदी भाषी वोटरों को ध्यान में रखकर पिछले कुछ महीनों में फैसले भी लिए। उन्होंने राज्य में एक हिंदी विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की है। अपनी पार्टी में हिंदी सेल गठित किया है, जिसका काम ही हिंदी भाषी लोगों से नियमित संवाद करने का है। बंगाल हिंदी समिति को पुनर्गठित करते करते हुए हिंदी भाषी लोगों में प्रभावी कई लोगों को शामिल किया। छठ पूजा पर दो दिन की सरकारी छुट्टी भी घोषित कर दी है। अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन तक का समर्थन भी जुटाया है, लेकिन बात बनती दिख नहीं रही है। यह धारणा काम कर रही है कि दीदी को दस साल हो गए, एक बार किसी और को मौका देकर देखा जाए।

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