हवश का शिकार हुई बच्ची ,यौन हिंसा पर रिसर्च को बनाया अपने जीवन का अहम हिस्सा।

हवश का शिकार हुई बच्ची ,यौन हिंसा पर रिसर्च को बनाया अपने जीवन का अहम हिस्सा।
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कहानी एक ऐसी लड़की की जो हमेशा संघर्ष करती रही लेकिन कभी हर नहीं मानी जी हाँ मैं बात कर रही हूँ तारा कौशल की जिसने अभी बोलना भी नहीं सीखा था ,कि उसके साथ कुछ ऐसा हुआ जिसका किसी को अंदाज़ा तक नहीं था। तारा एक छोटे से गांव की रहने वाली बच्ची थी , जिसके साथ मात्र 4 साल की उम्र में उसके ही घर के माली ने उसका बलत्कार किया था। तब से वह इस दर्द को झेल रही थी लेकिन जब वह 16 साल की हुई तब उन्होंने यौन हिंसा पर रिसर्च शुरु कर दी ,जिसमे उन्होंने 2017 में कई बलात्कारियों का इंटरव्यू किया,जिसके बाद वे अवसाद की चपेट में आ गयी , उनके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दया इतना ही नहीं अपने बेडरूम में खुद को बंद कर लिया और कई दिन तक वह बस रोती ही रहीं फिर एक दिन उन्हें लगा उन्हें थेरेपी की ज़रूरत है”।

तारा का समाज में अहम रोल।

कौशल अपने साथ हुई यौन हिंसा के बारे में वह लगातार बोल रही हैं, पब्लिक डिबेट में हिस्सा ले रही हैं, दोस्तों से चर्चा कर रही हैं ,और अब किताब भी लिख रही हैं। तारा ने लिखा है ,”उत्तर भारत का छोटे कद का ओ शख़्स जिसने जाड़े की धूप में छत के बरामदे पर बैठकर क्या कुछ किया था, मैं जितने लोगों से मिली वह उनमें सबसे शातिर यौन अपराधी था, उसने अपने छोटे से गांव की कई महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया था ” “उसे जेल में होना चाहिए था या फिर समाज से निष्कासित होना चाहिए था लेकिन वह अपने समुदाय का प्रभावी शख़्स बना हुआ था। रिसर्च के दौरान उन्होंने जेंडर आधारित हिंसा को लेकर सोशल मीडिया पर महिलाओं से बात की, जिसमे उनको दो पुरुषों के बारे में पता चला ,उन्होंने स्थानीय पुलिस, स्थानीय मीडिया, गैर सरकारी संगठनों और जासूसी करने वाली एजेंसियों से भी संपर्क किया।

डॉ. ने किया धरणा का खंडन।

हालाम यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान की लेक्चरर डॉ. मधुमिता पांडेय ने बलात्कार मामलों में सज़ा झेलने वालों को अपनी रिसर्च का विषय बनाया। एक रिसर्चर के तौर पर डॉ. ने उस धारणा पर काम करने का फ़ैसला लिया जिसमें माना जाता है ,कि बलात्कारी पुरुषों में महिलाओं के प्रति कहीं ज़्यादा परंपरागत और दमनकारी दृष्टिकोण मौजूद होता है, उन्होंने दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद 100 से ज़्यादा बलात्कारियों का साक्षात्कार किया है, इन सब लोगों की अपनी अपनी कहानियां है, एक सामूहिक बलात्कार की सज़ा झेल रहे शख़्स ने कहा कि वह हादसे के तुरंत बाद भाग निकला था,मंदिर के एक सफ़ाई कर्मचारी ने बताया कि पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने के लिए उसे उकसाया गया था, वहीं एक युवा ने दावा किया कि आपसी सहमति से उसने संबंध बनाए थे, लेकिन लड़की के परिवार वालों ने जब दोनों को एक साथ देख लिया तब उस पर बलात्कार का आरोप गया।


डॉ. मधुमिता महिलाओं के प्रति इन पुरुषों की सोच को समझना चाहती थीं ताकि उन्हें यौन हिंसा की सोच का पता चल सके,उन्होंने बताया, “अपराध की प्रकृति में अंतर के बावजूद एक बात कॉमन भी देखने को मिली, समाज में पुरुषों को जिस तरह का विशेषाधिकार मौजूद है उसका असर दिखा” कि बलात्कार पीड़िताओं पर दोष डाल रहे हैं और उनमें सहमति की समझ का अभाव है,प्रोफ़ेसर ने तारा की तरह ही एक प्रचलित धारणा का खंडन किया कि ‘बलात्कारी आमतौर पर परछाइयों में छिपे अजनबी होते हैं ,लेकिन इस मामले में ज़्यादातर लोग पीड़िताओं के पहचान वाले होते हैं , इसलिए कोई कैसे बलात्कारी हो जाता है इसे समझना आसान नहीं होता है ।

बलात्कारी कौन होता है , क्यों करते है ऐसा ?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 95 प्रतिशत मामलों में ऐसा ही था , सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाली संस्था प्रोजेक्ट 39 ए के कार्यकारी निदेशक डॉ. अनूप सुरेंद्रनाथ ने बताया, “बलात्कार के सभी मामले दर्ज नहीं होते क्योंकि अधिकांश में बलात्कारी पहचान वाले होते हैं,इसके चलते पीड़िता और उनके परिवार वालों पर अपराध की शिकायत दर्ज नहीं कराने के लिए कई तरह के दबाव होते है “ज़्यादातर वही मामले दर्ज होते हैं, जिसमें अपराध जघन्य होते हैं और वे सुर्खियों में आते हैं।

पुरुष बलात्कार क्यों करते हैं? डॉ. मधुमिता ने बताया, “इसका कोई एक जवाब नहीं है क्योंकि बलात्कार एक कॉम्प्लेक्स क्राइम है, बलात्कारी कोई भी हो सकता है ,देश के आम लोगों की तरह मैं भी सोचती थी कि जेल के अंदर मैं क्या सवाल जवाब करूंगी.,मुझे लगता था वे डरावने दिखने वाले होंगे – जिनके चेहरों पर कटे के निशान होंगे और वे हमसे अभद्रता भरे कमेंट्स कर सकते हैं यह सब सोच मुझे डर भी लगता था.”उन्होंने बताया, “जितना मैं उन लोगों से बात करने लगी, तब वे मुझे विचित्र नहीं लगे, यह हम सबको समझने की ज़रूरत है.”डॉ. के मुताबिक जेंडर वायलेंस के मुद्दे के निदान के लिए समाज को सामूहिक तौर पर आत्म अवलोकन करने की ज़रूरत है, रोज़मर्रा के जीवन में महिलाओं के साथ भेदभाव पर चर्चा नहीं होती, कार्यस्थल से लेकर सड़कों पर होने वाले उत्पीड़न की ओर संकेत करते हुए डॉ. मधुमिता बताती हैं कि जब तक स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं हो जाती तब तक कोई ध्यान नहीं देता ,डॉ. मधुमिता अब भारत में बलात्कारियों को लेकर सोच बदलने वाली पुनर्वास कार्यक्रम से जुड़ी हैं।

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