उस खौपनाक रात की पूरी कहानी ,जब हुई थी पंडित दयाल की मौत |

उस खौपनाक रात की पूरी कहानी ,जब हुई थी पंडित दयाल की मौत |
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वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे।उनका कहना था हम एकता चाहते हैं, तो हमें भारतीय राष्ट्रवाद को समझना होगा, जो हिंदू राष्ट्रवाद है, और भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति है।दरअसल हम बात कर रहे है पंडित दिन दयाल उपाध्याय की जिनकी आज पुण्य तिथि है।
उन्होंने अपनी परंपराओं और जड़ों से जुड़े रहने के बाद भी, समाज और राष्ट्र के लिए आवश्यक नवीन ,विचारों का सदैव स्वागत किया। तो आईये बताते है उनके जीवन से जुड़ी कुछ विशेष बाते | पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा जिले के नगला,चंद्रभान गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय और माता का नाम रामप्यारी था। उनकी माता अतयंत ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं।

उस खौपनाक रात की पूरी कहानी ,जब हुई थी पंडित दयाल की मौत |

3 वर्ष के ही उम्र में पिता का हो गया था निधन।

दीनदयाल 3 वर्ष के भी नहीं हुए थे, कि उनके पिता का देहांत हो गया| और उनके 7 वर्ष की उम्र में मां का भी निधन हो गया था।अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आएं, आजीवन संघ के प्रचारक रहे।1967 तक वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे।उपाध्याय जी का कहना था कि भारत की जड़ों से जुड़ी राजनीति, अर्थनीति और समाज नीति ही देश के भाग्य को बदलने का सामर्थ्य रखती है। कोई भी देश अपनी जड़ों से कटकर विकास नहीं कर सका है। संसद का साल 1968 का बजट सत्र शुरू होने वाला था बिहार प्रदेश के जनसंघ के तत्कालीन संगठन मंत्री अश्विनी कुमार की इच्छा थी कि, इस बैठक में जनसंघ अध्यक्ष पंडित दीनदयाल भी शामिल हों. दीनदयाल जी ने उनकी ये बात स्वीकार्य कर ली और तकरीबन 2.15 बजे पर उनकी गाड़ी मुगलसराय स्टेशन पर पहुंची” चूँकि पठानकोट-सियालदह एक्सप्रेस पटना नहीं जाती थी, इसलिए बोगी काटकर दिल्ली-हावड़ा ट्रेन से जोड़ दी गई.इसमें करीब आधे घंटे का वक्त लगा और 2 बजकर 50 मिनट पर ट्रेन फिर से पटना के लिए चल पड़ी जहा बिहार जनसंघ के नेता उनका इंतजार कर रहे थे तो वही 3 बजे उनका शव ट्रेन की पटरियों पर मिला. और आज तक ये गुत्थी सुलझी नहीं।

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